ब्रिक्स को कमजोर करता चीन

– आर.के. सिन्हा

दुनिया भर में आतंकवाद से लड़ने के मामले में भारत को छोड़कर शेष ब्रिक्स देशों की लुंजपुंज नीति इसकी उपयोगिता पर ही सवाल खड़े करती है। प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को वर्चुअल रूप से संबोधित करते हुए दुनियाभर में आतंकवाद के बढ़ते खतरों पर चिंता जताते हुए संकेतों में ही सही, चीन और पाकिस्तान को आड़े हाथों लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ये दोनों देश दुनिया में आतंकवाद फैलाने में मदद करते हैं और उसे खाद-पानी देते रहते हैं। चीन तो ब्रिक्स का सदस्य ही है। भारतीय प्रधानमंत्री जब अपनी बात रख रहे थे, चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग बड़े ध्यान से उन्हें सुन रहे थे। कहीं न कहीं वे सोच रहे होंगे कि मोदी जी का इशारा उन्हीं की तरफ है।

हैरानी इस बात की है कि भारत को छोड़कर ब्रिक्स का कोई भी अन्य देश पाकिस्तान या चीन के खिलाफ शिखर सम्मेलन में नहीं बोला। किसी ने भी चीन से यह सवाल नहीं पूछा कि वह क्यों आतंकवाद की फैक्ट्री पाकिस्तान का साथ देता है या ब्रिक्स के साथी देश भारत की सरहद पर जंग के हालात पैदा कर रहा है?

ब्रिक्स उभरती अर्थव्यवस्थाओं का संघ है। इसमें ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं। ब्रिक्स की स्थापना 2009 में हुई थी। इसे 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल किए जाने से पहले “ब्रिक” ही कहा जाता था। रूस को छोड़कर ब्रिक्स के सभी सदस्य विकासशील या नव औद्योगीकृत देश ही हैं जिनकी अर्थव्यवस्था विश्व भर में आज के दिन सबसे तेजी से बढ़ रही है।

क्या आतंकवाद के मसले पर सभी ब्रिक्स देशों को चीन और पाकिस्तान के खिलाफ समवेत स्वर से बोलना नहीं चाहिए था? क्या ब्रिक्स को चीन की निंदा नहीं करनी चाहिए थी कि वह ब्रिक्स के ही एक सदस्य देश भारत की सीमा पर जंग के हालात पैदा कर रहा है? दुनिया की 40 फीसद से अधिक आबादी ब्रिक्स देशों में ही रहती है। कहने को तो ब्रिक्स के सदस्य देश वित्त, व्यापार, स्वास्थ्य, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, शिक्षा, कृषि, संचार, श्रम आदि मसलों पर परस्पर सहयोग का वादा करते रहते हैं। पर चीन ब्रिक्स आंदोलन को लगातार कमजोर कर रहा है। चीन भारत के साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार कर रहा है। चीन के इस रवैये पर रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका चुप लगाये रहते हैं। जिस रूस से भारत के पुराने और एतिहासिक कूटनीतिक संबंध है वह भी चीन के खिलाफ एक शब्द भी बोलने को तैयार नहीं है। इस मामले में ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की भी बोलती बंद ही रहती है।

ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका से संबंध
भारत के दक्षिण अफ्रीका से महात्मा गांधी और ब्राजील से फुटबॉल के चलते प्रगाढ़ सबंध हैं। गांधी जी 1893 से लेकर 1915 तक दक्षिण अफ्रीका में ही रहे और मूल नागरिक अधिकारों के लिए सत्याग्रह करते रहे। 1915 में वह भारत लौटे। बापू ने 7 जून,1893 को दक्षिण अफ्रीका में ही “सविनय अवज्ञा” का पहली बार इस्तेमाल किया था। दक्षिण अफ्रीका के जननेता नेल्सन मंडेला उनसे प्रेरणा लेते रहे। दक्षिण अफ्रीका में रहने के दौरान गांधीजी को कई बार गिरफ्तार किया गया। लेकिन, सच की लड़ाई लड़कर जीतने वाले उसी नेल्सन मंडेला का वही दक्षिण अफ्रीका आज सच के साथ खड़ा नहीं होता। वह चीन को कोसता तक नहीं कि चीन की नीतियों के कारण ब्रिक्स कमजोर हो रहा है।

उधर, भारत के करोड़ों फुटबॉल प्रेमी ब्राजील की फुटबॉल टीम और उसके सितारों को चीयर करते रहे हैं। भारतीय फुटबॉल प्रेमियों की ब्राजील को लेकर निष्ठा शुरू से रही है। हालांकि लैटिन अमेरिकी स्पेनिश भाषी ब्राजील देश भारत से हजारों किलोमीटर दूर है, पर हमारे फुटबॉल प्रेमी ब्राजील में ही भारत की छाप देखते हैं। पेले, रोमोरियो से लेकर रोनोल्डो जैसे ब्राजील के खिलाड़ियों ने भारत में अपनी खास जगह बनाई हुई है। पर ब्राजील भी भारत का साथ नहीं देता। याद नहीं आता कि कभी इन देशों ने भारत के हक में आवाज बुलंद की हो।

अव्वल दर्जे का दुष्ट कौन
चीन तो अव्वल दर्जे का बेशर्म देश है। उसके विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता कहते हैं, ‘आतंकवाद सभी देशों के लिए एक आम चुनौती है। पाकिस्तान ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी आजादी की लड़ाई में जबरदस्त प्रयास और बलिदान किया है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उसका सम्मान करना चाहिए और पहचान भी की जानी चाहिए। चीन सभी तरह के आतंकवाद का विरोध करता भी रहा है। लेकिन, चीन अपने स्वार्थ में अब बदला-बदला सा नजर आ रहा है। दरअसल सारी दुनिया को पता है कि जब समूची विश्व बिरादरी पाकिस्तान पर आतंकवाद को लेकर सख्त कदम उठाने के लिए दबाव बनाती रही है, तब दुष्ट चीन पाकिस्तान को बेशर्मी बचाता रहा है।

दरअसल पाकिस्तान दुनियाभर में आतंकवाद की फैक्ट्री के रूप में अपने को स्थापित करके बदनाम हो चुका है। दुनिया में कहीं भी कोई आतंकवाद की घटना हो, उसमें किसी पाकिस्तानी का हाथ अवश्य होता है। जिस देश ने ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादी को संरक्षण प्रदान किया उस देश पर दुनिया यकीन किस आधार पर करेगी? लादेन वहां पर पूरे कुनबे के साथ पुर्णतः सुरक्षित माहौल में मस्ती कर रहा था। उसी पाकिस्तान में हाफिज सईद और अजहर महमूद जैसे आतंकी पल रहे हैं। इन्हें पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई से ही तो संरक्षण और धन मिलता है। इस तरह के आतंकवादी पाकिस्तान और उसके आका चीन के खिलाफ ब्रिक्स एक स्तर से बोलने में डरता क्यों है? क्या आतंकवाद सिर्फ भारत का मसला है?

कोरोना महामारी के चलते ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इसबार वर्चुअली आयोजित हुआ। ब्रिक्स सम्मेलन में अपने संबोधन के दौरान मोदी जी ने आतंकवाद के मुद्दे पर बिना नाम लिए पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को आड़े हाथों लिया। पाकिस्तान का नाम लेने की जरूरत भी नहीं थी। उसके बारे में सबको पता है। उसके विपरीत भारत की संस्कृति में पूरे विश्व को एक परिवार की तरह माना गया है। पीस कीपिंग में सबसे ज्यादा सैनिक भारत ने ही खोए हैं।

कहने की जरूरत नहीं है कि आतंकवाद आज विश्व के सामने सबसे बड़ी समस्या के रूप में खड़ी है। इसे हम हाल के समय में फ्रांस से लेकर स्वीडन तक में देख रहे हैं। भारत तो आतंकवाद के कारण अपने दो प्रधानमंत्रियों को भी खो चुका है। वक्त की मांग है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि आतंकवादियों को समर्थन और सहायता देने वाले देशों को भी दोषी ठहराया जाए। तभी तो इस समस्या का संगठित तरीके से मुकाबला किया जा सकता है।

बेशक, ब्रिक्स दुनिया से आतंकवाद को खत्म करने के स्तर पर एक बड़ी मुहिम चला सकता था। पर अभीतक उसके कदम इस लिहाज से तेज रफ्तार से नहीं बढ़े हैं। यह चिंतनीय है कि संसार का इतना महत्वपूर्ण संगठन आतंकवाद से लड़ने में अपनी जरूरी भूमिका नहीं निभा पा रहा है।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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