रात के अंधेरे में निकलता है कुत्तों का रखवाला


प्रतिदिन की कमाई का 25 प्रतिशत हिस्सा मूक जानवरों के लिए खर्च करता है
इन्दौर।  आधी रात में… जब सन्नाटा पूरे शहर में पसर जाता है… शहर के बाशिंदे जब नींद की आगोश में होते हैं…तब दिनभर भाग‑दौड़ कर अपनी सादगीभरी जिंदगी जीने के साथ ही दिनभर में कमाए गए रुपए का एक हिस्सा निकालकर मूक जानवरों के पेट की फिक्र करते हुए देर रात उनके लिए भोजन लेकर निकलता है श्वानों का मसीहा। यह करीब 4 से 5 किलोमीटर शहर में घूमकर भूखे श्वानों को निजी खर्च से भोजन देता है, जिसमें उसे बड़ा सुकून मिलता है।
आम नागरिकों के साथ ही छोटे-छोटे बच्चों पर श्वानों के हमले और उन्हें गंभीर रूप से नोंचते हुए जख्मी करने वाली खबरों को लगातार समाचार पत्रों में पढऩे से विचलित हुए शहर के एक नौजवान ने हमउम्र के लोगों से एक कदम आगे जाकर कुछ ऐसा कर दिखाया कि परिवार के साथ ही उस पर पूरे शहर को भी नाज करना चाहिए। हम बात कर रहे हैं परिवार से दूर रहकर छोटा बागंड़दा रोड स्थित ईशा एवेन्यू में रहने वाले अनिकेत गुप्ता की, जो महज 24 वर्ष की आयु में इतनी बड़ी सोच रखते हैं कि अपनी दिनभर की कमाई का एक हिस्सा मूक पशुओं पर खर्च कर पुण्य अर्जन करने का कार्य कर रहे हैं।

कभी तोस तो कभी ब्रेड खिलाता है
अपनी उम्र के युवा जब डिजिटल होती इस दुनिया में रात में अपने मोबाइल पर लगे होते हैं, तब अनिकेत आधी रात करीब 12 बजे अपने पशुप्रेम के चलते दोपहिया वाहन पर बड़ा सा थैला लेकर बांगड़दा रोड स्थित ईशा एवेन्यू से इन्दौर वायर, जिन्सी, टोरी कार्नर, बड़ा गणपति, पूरे एरोड्रम रोड की कालोनियों में छोटी-छोटी गलियों में दिनभर खाने को तरसते भूख से विचलित श्वानों को अलग-अलग प्रकार का बेकरी आइटम जैसे तोस तो कभी ब्रेड का भोजन कराते हुए घर लौट आते हैं।

मूक प्राणियों के लिए खोलना चाहते हैं एनजीओ… ताकि मिल सके भोजन और चिकित्सा
मूक पशुओं के प्रति दिल में जगह रखने वाले अनिकेत ने बताया कि वह शहरभर के मूक पशुओं के लिए एक ऐसा एनजीओ खोलना चाहते हैं, जिससे कि उनके लिए भोजन से लेकर उनके इलाज तक की सारी सुविधाएं जुटाई जा सकें। पहले की तरह वर्तमान में गलियों में घूमने वाले इन मूक पशुओं को भोजन कोई भी नहीं देता है। दूसरी तरफ स्वच्छवता में नंबर वन बनने के साथ ही घरों के पीछे पाई जाने वाली गंदगी भी अब दिखाई नहीं देती, जिससे यह अपना पेट भर लिया करते थे। यही मुख्य वजह है कि शहर में एक साल में करीब 50 हजार लोगों को डॉग बाइट का सामना करना पड़ा। एनजीओ खोलने के साथ ही सामाजिक लोगों की मदद से ही इस ओर कोई ठोस कदम उठाया जा सकता है।

25 प्रतिशत हिस्सा प्रतिदिन निकालते है श्वानों के लिए
अनिकेत जब रात 12 बजे परोपकारी कार्य कर रहे थे, तभी अग्निबाण की टीम ने उन्हें देखा और चर्चा की तो उन्होंने बताया कि उनका पूरा परिवार राजगढ़ जिले में रहता है और वह यहां पर अकेले रहते हुए पॉलिथीन के स्थान पर चलन में आए कैरीबैग बनाने का कारखाना संचालित करते हैं। दिनभर कैरीबैग बनाने के कारखाने से अर्जित किए गए लाभ का वह करीब 25 प्रतिशत हिस्सा इन मूक प्राणियों के लिए निकालते हैं। अनिकेत दिनभर में करीब 1500 से 2000 रुपए कमा लेते हैं।

गरीबों की सहायता के लिए भी तत्पर रहे
मूक प्राणियों के पेट की चिंता के साथ ही यह युवा गरीबों के लिए सेवा कार्य करता है। ठंड के दिनों मेंं जहां इसने अपने निजी खर्च से फुटपाथ पर जीवन‑यापन करने वाले गरीब परिवारों को कम्बल, गर्म कपड़े दिए और कई बार उन्हें भोजन भी करवाया।

Shar­ing is car­ing!

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