राम के गृहप्रवेश पर भी राजनीति

- सियाराम पांडेय शांत

चैत्र नवरात्र के प्रथम दिन भगवान राम को उनका अस्थायी निवास मिल गया। टेंट से निकलकर वे बुलेटप्रूफ वैकल्पिक भवन में पहुंच गए। जब तक मंदिर बनकर पूरी तरह तैयार नहीं हो जाता तबतक रामलला अपने भाइयों भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के साथ यहीं विराजेंगे। अयोध्या राजभवन की ओर से प्रदत्त 9.5 किलोग्राम के चांदी के सिंहासन पर रामलला विराज गए हैं। उनका सूर्य की आकृति वाले रजत सिंहासन पर विराजना भी बेहद गौरव की बात है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद उन्हें गोद में उठाकर नए बुलेटप्रूफ मंदिर में ले गये।

जब पूरा देश वैश्विक महामारी कोरोना को लेकर चिंतित है। देशभर में 21 दिन का लॉकडाउन चल रहा है। किसी भी व्यक्ति को अपने घर से निकलने की इजाजत नहीं है। ऐसे कठिन दौर में भगवान राम का नवग्रह प्रवेश बेहद सुकूनदेह है। 1528 में जब मीर बाकी ने प्रभु श्रीराम का मंदिर ढहाया था, तब से अबतक वे चांदी के सिंहासन पर नहीं विराजमान थे।चांदी शुभता का प्रतीक है। भगवान राम सकल मंगलों की खान हैं। नवरात्र में ही रामनवमी पड़ती है। इसी तिथि को भगवान राम का जन्म हुआ था। यह लोक को आनंद देने वाला है। जिस विधि विधान के साथ रामलला को नए घर में लाया गया है,उससे अब सब कुछ कुशल‑मंगल ही होगा, इसकी उम्मीद तो की जा सकती है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का अयोध्या पहुंचना और भगवान राम के नवगृह प्रवेश में भाग लेना, विपक्ष को रास नहीं आया है। उसने उनपर प्रधानमंत्री की बात न मानने का आरोप लगाया है। विपक्ष का तर्क है कि जब महत्वपूर्ण पद पर बैठे लोग ही प्रधानमंत्री की बात नहीं मानेंगे तो आम जनता कैसे मानेगी? उनके इस तर्क में दम हो सकता है लेकिन प्रदेश का मुखिया होने के नाते योगी की अपनी कुछ जिम्मेदारियां भी हैं।मुखिया ही अगर घर में बैठ जाएगा तो इससे परिवार का मनोबल गिरता है। योगी ने मुख्यमंत्री के रूप में अपने फर्ज का ही निर्वाह किया है।मुखिया के स्वस्थ रहने में ही परिवार का हित है लेकिन मुखिया तो मुख है, इसे सबका ख्याल रखना पड़ता है। मुखिया मुख सो चाहिए खान पान व्यवहार। योगी इसके अपवाद नहीं हो सकते। यह सच है कि कोरोना वायरस बड़ी चुनौती है लेकिन रामलला का मामला भी बहुत पुराना है। नवरात्र में हर देवी मंदिरों में भक्तों के प्रवेश पर रोक है। हर प्रमुख मंदिरों के कपाट बंद हैं और यह सब कोरोना वायरस से बचाव के दृष्टिगत किया गया है। भक्त और भगवान के बीच पार्थिव दूरी हो सकती है लेकिन मानसिक और दिली तौर पर भक्त भगवान के और भगवान भक्त के ही पास रहते हैं।

कोरोना से निपटने के लिए मुख्यमंत्री ने आज भी अपने विचार रखे हैं। लोगों से सामाजिक दूरी बनाने को कहा है। 6 दिसम्बर 1990 से ही रामलला तिरपाल में रह रहे थे। इस बीच अदालतों में उनके अस्तित्व को नकारने के कितने प्रयास हुए, यह किसी से छिपा नहीं है। उन्हें काल्पनिक ठहराने की भी पुरजोर कोशिश हुई। अयोध्या वहां थी भी या नहीं, इसे लेकर ढेरों तर्क दिए गए। अयोध्या की स्थापना महाराज मनु ने की थी तब से यह भगवान राम के पूर्वजों और वंशजों केे पास थी। राम के वंश का अंतिम शासक महाभारत के युद्ध में अभिमन्यु के हाथों मारा गया था। उस अयोध्या को वोटों की राजनीति और जमीन के छोटे से टुकड़े के लिए नकारने की कोशिश सच से मुंह मोड़ने जैसी ही थी। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर भी सवाल उठाए गए।

जो अयोध्या राम की थी, है और रहेगी, उसी अयोध्या में उन्हें लंबे समय तक एक अदद छत नसीब नहीं हो पाई, इससे अधिक विडंबनापूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है? हालांकि कोरोना के चलते भूमि पूजन भी टल रहा है लेकिन उम्मीद है कि अप्रैल के अंतिम सप्ताह में भूमि पूजन की तिथि भी तय हो जाएगी और भूमि पूजन भी हो जाएगा। राम प्रसन्न होंगे तो पूरी धरती से आपदाओं का शमन हो जाएगा। राम विमुख होंगे तो कुछ भी अनुकूल नहीं रहेगा। मानसकार ने लिखा है कि राम विमुख सम्पति प्रभुताई, जाई रही पाई बिनु पाई। भगवान राम के वैकल्पिक घर में प्रवेश को राजनीति का विषय बनाने वालों को चाहिए कि वे भगवान का स्मरण कर देश के आरोग्य लाभ की कामना करें। यही लोकहित का तकाजा भी है। राम पर राजनीति करने से अच्छा होगा कि काम की,उत्थान की राजनीति की जाए।

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)

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