आइटम तो जनता होती है… वोट देकर रोती है…


मान तो मंत्री का ही होता है और जो सत्ता में नहीं रहा, वो उसका अपमान कैसे कर सकता है… कमलनाथ शब्दों की मर्यादा भूल जाएं… एक मंत्री पर लांछन लगाएं और वो मंत्री भी महिला निकल जाए तो पूरी नारी जाति अपमानित न हो जाए, सोचना चाहिए कमलनाथजी को… भले ही वो मंत्री सारे मतदाताओं को जूते पर बैठाए… वोट डालने वालों की औकात कौडिय़ों की बताए… चुनाव जीतने और जिताने का जादूगर कलेक्टर को बताए और सरेआम यह कहती नजर आए कि सरकार जिस कलेक्टर को इशारा कर दे, वो सीट हमें जिताकर दिखाए तो यह लोकतंत्र का अपमान कैसे हो सकता है… और उस मंत्री को कोई कैसे रोक सकता है… वो तो यह भी दम भरती है कि मैं विधायक रहूं या न रहूं, मंत्री जरूर बनूंगी… अब सारा प्रदेश भले ही छाती पीटता नजर आए… भाजपाई उसे सिर पर बैठाएं… लेकिन मतदाताओं को तो मंत्री ने सड़क पर ला ही दिया है… बात यहीं थम जाती तो बात थी… वो तो सरकार को भी कठपुतली मानती है… मतदाताओं को ललकारती है… और जिस कांग्रेस के पलने में पलकर राजनीति की चाल चलना सीखा उसे गंदगी का दलदल मानती है… जो इमरती देवी अपनों की छिछालेदारी करने से बाज नहीं आती हैं… कमलनाथ पर विधायकों को 5-5 लाख देकर पालने और सरकार टिकाने का आरोप लगाती हैं… उसमें सिंधिया समर्थक विधायकों को भी बिकाऊ बताकर अपने साथियों तक के मान की धज्जियां उड़ाती हैं… उन्हें यदि कमलनाथ आइटम कहकर निशाना लगाएं और खुद घायल हो जाएं तो उनकी हालत उन्हीं मतदाताओं की तरह है, जो इमरती देवी की जुबान और मिजाज से जख्मी पड़े हैं… जिस तरह जनता खामोश है, उसी तरह कमलनाथ को भी जुबान बंद रखना चाहिए… जो इमरती देवी जनता के बजाय कलेक्टर को जिताऊ और विधायक को बिकाऊ मानती हैं, उनके आगे नतमस्तक रहना चाहिए… और ये तो समझना चाहिए कि यदि इमरती देवी को कुछ कहेंगे तो पूरी नारी जाति के अपमान का कारण बन जाएगा… फिर इमरती देवी उसके जवाब में उन्हें राक्षस, दुष्ट और चरित्रहीन कहें तो लोग इसे उनके कहे का निवारण समझेंगे… क्योंकि समाज में केवल नारी जाति और नारी शक्ति का ही अपमान होता है… पुरुष तो बेचारा दुष्ट और दानव और कमजोर-शिथिल ही रहता है… खेद व्यक्त भी कर दे तो उसे दंड देने से जमाना नहीं चूकता है… रोती हुई नारी को देखकर हर किसी का दिल पसीजता है… रोता हुआ पुरुष तो कमजोर और कायर लगता है… उसका रोना भी कोई रोना होता है… इमरती देवी आंसू बहाएं… सिंधियाजी तक ललकार लगाएं… बेचारा मतदाता अपना वोट बिकता देखकर, सरकार गिरती देखकर जगह-जगह अपना अपमान होता देखकर बिलख भी न पाए… बटन दबाए और चला आए… क्योंकि चुनाव तो कलेक्टर को जिताना है… इमरती देवी के शब्दों को सार्थक बनाना है…

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