आखिर कब शांत होगा सुशांत…


इस मौत की भी अजब कहानी है…दुनिया कैसे-कैसे लोगों की दीवानी है…एक बुजदिल, कायर, डरपोक, जिंदगी से भागने वाले…अनैतिक संंबंधों की बदबू से भरे फिल्मी पर्दे के नायक और भारतीय संस्कृति और संस्कार के खलनायक के लिए पूरा जमाना विचलित नजर आ रहा है…दिन-रात देश के चैनल चीख-पुकार मचा रहे हैं…राजनीति मातम मना रही है…परिवार मौत की सुर्खियां बटोर रहा है…एक प्रेमिका अपना प्रेमी छीनने वाली दूसरी प्रेमिका पर तोहमतें लगा रही है…आरोपों में घिरी मायानगरी बेबस नजर आ रही है…दो राज्यों की सरकारें सुशांत के फंदे के धागों में साजिशों की तलवारें बांध रही हैं…सोशल मीडिया की मंडियों में हर दिन एक नई कहानी सुनाई जा रही है…कोई फिल्मकार क्या कोई फिल्म बनाएगा… यहां तो हर दिन बदलती कहानी के साथ एक नई फिल्म दिखाई जा रही है…देश में न चरित्र रहा न चिंतन…न व्यक्ति रहा…न व्यक्तित्व…आखिर है कौन है यह सुशांत…जो समाज की मर्यादाओं को लांघता है…बिना शादी के प्रेमिका को घर पर पालता है…एक को छोडक़र दूसरी पर दिल लुटाता है…और जब खुद लुटने लग जाता है तो जान को फंदे पर लटकाता है… है कौन यह सुशांत का बाप….जो बेटे की कमाई खाता है.. मानसिक अवसाद में घिरे अपने बेटे को अकेला छोड़ दूसरे शहर में खुशहाल जीवन बिताता है..उसका हौसला बढ़ाने या गम मिटाने का कत्र्तव्य तक नहीं निभाता है… और उसकी मौत पर चीखता-चिल्लाता है… प्रेमिका को बदचलन बताता है… अपने बेटे की हकीकत पर पर्दा डालता है… है कौन उसकी बहन… जो अपने भाई की राखी के बंधन की हिफाजत नहीं कर पाती है…उसके दु:ख को नहीं पहचानती है…अपनी सारी गलतियां किसी और पर उंडेलकर शरीफ बनना चाहती है… हैं कौन दोस्त… जो चैनलों पर आकर दास्तानें सुना रहे हैं… और अपने गिरेबां में नहीं झांक पा रहे हैं…जिनके रहते उनका मित्र मरने पर मजबूर हो गया…और इस फिल्म की दु:खी नायिका यानी प्रेमिका अंकिता लोखंडे जो अपना प्रेमी छीनने वाली रिया को निशाना बना रही है… उस पर ड्रग्स देने का इल्जाम लगा रही है…अब कोई सुशांत दूध पीता बच्चा तो था नहीं, जिसकी बोतल में नशा डालकर पिलाया और सब कुछ हड़पने का षड्यंत्र रचाया… रिश्तों की इस गंदी नाली के कीचड़ में सारे के सारे गंदगी से भरे पड़े हैं… इस सड़ांध में संवेदनाओं की खुशबू कहां से आ सकती है…ऐसे सुशांत मरते रहेंगे, जो समाज की मर्यादाओं को लांघकर अनैतिक संबंधों की कानूनी पनाह बने लिव इन रिलेशनशिप में शरण लेंगे और अपनी जिंदगी का हरण करेंगे…ऐसी रिया आंसू बहाती रहेगी, जो शर्म और हया का आंचल छोडक़र दौलत, शोहरत को गले लगाएगी और मोहब्बत को ठोकर लगाएगी…लाचार और लालचियों के जिस कुनबे को तिरस्कृत किया जाना चाहिए उनको चैनलों का नायक बनाया जा रहा है…जिन पर तोहमतें और लानतें बरसाई जाना चाहिए उन्हें रहनुमा बनाया जा रहा है…पता नहीं यह देश कहां जा रहा है…जिस देश में लाखों लोग परिस्थितियों से लड़ते हैं…बुरे वक्त में घिरते हैं…हर जिल्लत और हर किल्लत को सहकर भी जिंदा रहते हैं…वह गुमनामी में रहते हैं…जिस देश में शास्त्रीजी जैसे महान नेता संदिग्ध मौत मरते हैं…देश को आजादी दिलाने वाले नेताजी सुभाषचंद्र बोस भी कहानियां में दम तोड़ते हैं…उनकी मौत की जांच कराने के लिए सरकार के दीदे नहीं उठते हैं… अदालतों के दरवाजे नहीं खुलते हैं…क्योंकि हमारे चैनल कमाऊ कहानी ढूंढते हैं…हमारे नेता रंजिशों और साजिशों के जाल बुनते हैं और हम नायकों की खलनायकी को नहीं समझते हैं… इसीलिए सुशांत मरकर भी जिंदा रहते हैं…

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