दुर्दांतों से हैवान निकली योगी सरकार

जुबान बच्ची की कटी, पूरा देश गूंगा हो गया…
देशभर की खामोश मौत… ऐसी दरिंदगी… ऐसी हैवानियत… ऐसी वहशियत… कई शैतान एक मासूम युवती के साथ वहशियत करते हैं… नोंच-नोंचकर उसके अंगों को रौंद डालते हैं… वह अपने साथ हुई बर्बरता बयां न कर पाए, इसलिए उसकी जुबां तक काट डालते हैं… अपनी बेटी की हालत देखकर छाती पीटते मां-बाप अस्पतालों में भटकते हैं और यातनाएं झेलती वो अबला रास्ते में ही दम तोड़ देती है… वहशियत की यह कहानी तब और बर्बर हो जाती है, जब उस अबला की सिहरन से गूंजती आवाजों को खामोश करने के लिए योगी सरकार के दानवी चेहरे रोते-बिलखते मां-बाप से उनकी बच्ची का शव छीनकर उसे रात के अंधेरे में चिता के हवाले कर डालते हैं… सर पटकते मां-बाप के साथ जुल्म और ज्यादती का नंगा नाच पूरा देश देखता है, लेकिन जुबान बच्ची की कटती है, पर पूरा देश गूंगा होकर देखता रहता है…इस खामोशी का आलम फिर दूसरे दिन उत्तरप्रदेश के दूसरे शहर में भी दिखता है…फिर एक मासूम बच्ची के साथ बलात्कार होता है…फिर खाकी वर्दी में पहुंची दानवी पुलिस मां-बाप से हैवानों की शातिरता का इकलौता सबूत उस बच्ची का शव छीनकर फूंक डालती है और दूसरे दिन अखबारों में एक खबर पनाह मांगती है कि बच्ची के साथ कोई दुष्कर्म नहीं हुआ…इतने वीभत्स कांडों को दोहराती पुलिस के नराधम हौसले उस सरकार की शह पर बुलंद हो रहे हैं, जो एक मां-बाप से उसकी बच्ची के अंतिम संस्कार का हक छीनकर दूसरी बच्ची के साथ भी ऐसा करने की हिमाकत कर गुजरे… ऐसा जुल्म तो अंग्रेजों की कैद में रहे देश में नहीं हुआ…ऐसा जुर्म तो कभी इस आजाद देश की धरती पर नहीं दिखा…ऐसी खामोशी जो पूरे देश की संवेदनाओं को नहीं जगा पाई…ऐसी यातना जो बच्ची ने नहीं भोगी होगी, उससे ज्यादा उसके मां-बाप के दिल पर गुजरी होगी…यह योगी सरकार है या रोगी सरकार…जो अपराध मिटाना नहीं छुपाना और बढ़ाना चाहती है…जो दुर्दांतों की हिमाकतों को पालना चाहती है…जो ऊंच-नीच, जात-पांत को पालना चाहती है…हैरत इस बात की है कि भगवा में लिपटे योगी अधर्म को पाल रहे हैं और मानवता के पुजारी नरेन्द्र मोदी खामोश रहकर योगी का हौसला बढ़ा रहे हैं… विरोध करने वाले विपक्षी नेता धकियाए जा रहे हैं…खरीदे हुए चैनलों के भोंपू बहस की जाजम बिछाए हुए हैं… सच तो यह है कि हम अपने हाथों से अपने पैरों में गुलामी की बेडिय़ां डाल रहे हैं… आजादी के लिए लडऩे वाले शहीद आज मातम मना रहे होंगे… इससे तो अच्छी अंग्रेजों की गुलामी को मान रहे होंगे…तब पूरा देश जुल्म से लडऩे के लिए खड़ा होता था, आज मौन रहकर मौत देखता रहता है…सब कुछ सहता है…कुछ नहीं कहता है…कहने से डरता है, क्योंकि इस देश में जुबान काटने वाला आतताई सरकार की शरण में पलता है…बोलने वालों को खामोश करने के लिए कलेक्टर तक खड़ा होकर देख लेने की खुलेआम धमकी देता है…कैसा हो गया है यह देश, जिसके परिवेश में हिफाजत की कसम खाने वाला ही जान लेने की हिमाकत करते हैं…. और शरीफ बेमौत मरते हैं…

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